
अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता की समस्यता से जूझ रहे नीतीश कुमार ने नया दांव चला है। निजी क्षेत्र में आरक्षण का मुद्दा उन्होंने उछाला है। इस मांग के प्रति वे गंभीर हैं, यह संदेश देने के लिए राज्य सरकार की तरफ से दिए जाने वाले ठेकों में आरक्षण लागू करने का फैसला उन्होंने अपने मंत्रिमंडल से करवा लिया। अब गेंद केंद्र के पाले में फेंक दी है- यह कहते हुए कि निजी क्षेत्र में आरक्षण का निर्णय संसद ही ले सकती है। नीतीश जानते हैं कि केंद्र के लिए ऐसा फैसला लेना आसान नहीं है। तो उन्होंने अपने सहयोगी दल भारतीय जनता पार्टी के लिए एक दुविधा खड़ी की है। पिछले जुलाई में उन्होंने राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस से संबंध तोड़कर आनन-फानन भाजपा से गठबंधन बनाया। लेकिन अब सियासी दायरे में यह आम चर्चा है कि दीर्घकालिक राजनीति के नजरिए से ये उनके लिए घाटे का सौदा साबित हो रहा है। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी के दौर वाली पार्टी नहीं है। नई भाजपा पर कोई सहयोगी दल अपनी शर्तें नहीं थोप सकता। यह अहसास नीतीश कुमार को हो चुका है। केंद्रीय मंत्रिमंडल में अपनी पार्टी को शामिल करवाने में वे नाकाम रहे। यहां तक कि प्रधानमंत्री मोदी से पटना विश्वविद्यालय को सेंट्रल यूनिवर्सिटी का दर्जा भी नहीं दिलवा पाए। आम चर्चा है कि लोकसभा चुनाव में भाजपा नीतीश के जनता दल (यू) को गिनी-चुनी सीटें ही ऑफर करने वाली है। बात समझी भी जा सकती है। जब बिहार से भाजपा और उसके पुराने सहयोगी दलों के 31 लोकसभा सदस्य हैं, तो खाली सीटें महज नौ बचती हैं। नीतीश इससे अधिक सीटों पर अपनी पार्टी को लड़वाने की आशा नहीं कर सकते। और एक बार लोकसभा चुनाव में उन्होंने अपनी सियासी जमीन खाली की, तो फिर विधानसभा चुनाव में भी उन्हें भाजपा का जूनियर पार्टनर बनना पड़ेगा। जनाधार के लिहाज से नीतीश कुमार बिहार में तीसरी बड़ी ताकत से आगे कभी नहीं बढ़ सके। भाजपा से गठबंधन के बाद उनका मुस्लिम वोट बैंक खिसक चुका है। सवर्ण मतदाता भाजपा के पाले में हैं। तो नीतीश की क्या प्रासंगिकता बचती है? ऐसे में दलित-पिछड़ी जातियों में पैठ बनाना उन्हें एकमात्र रास्ता नजर आया होगा। तो ऐसा मुद्दा उछाला है, जिससे लालू प्रसाद के समर्थन आधार को तोड़ने की आशा उन्हें होगी। हाल बदतर हुआ और भाजपा से संबंध टूटा तो उसे पिछड़ा विरोधी दिखाने की तरकीब पास रहे, यह जुगत भी उन्होंने भिड़ाई है। लेकिन नीतीश का दुर्भाग्य यह है कि उनका गेमप्लान सबको समझ में आ रहा है।
नीतीश कुमार ने चली नई चाल आरक्षण के मुद्दे पर मोदी को कर दिया ढेर - YouTube |
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| People & Blogs | Upload TimePublished on 15 Nov 2017 |
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